Thursday, February 7, 2019

हरा हरा कर, हरा

हरा हरा कर, हरा-
हरा कर देने वाले सपने।
कैसे कहूँ पराये, कैसे
गरब करूँ कह अपने!

भुला न देवे यह ’पाना’-
अपनेपन का खो जाना,
यह खिलना न भुला देवे
पंखड़ियों का धो जाना;

आँखों में जिस दिन यमुना-
की तरुण बाढ़ लेती हूँ
पुतली के बन्दी की
पलकों नज़र झाड़ लेती हूँ।
                              -माखनलाल चतुर्वेदी

No comments:

Post a Comment