Thursday, February 7, 2019

उपेक्षा

इस तरह उपेक्षा मेरी, 
क्यों करते हो मतवाले!
आशा के कितने अंकुर, 
मैंने हैं उर में पाले॥

विश्वास-वारि से उनको, 
मैंने है सींच बढ़ाए।
निर्मल निकुंज में मन के, 
रहती हूँ सदा छिपाए॥

मेरी साँसों की लू से 
कुछ आँच न उनमें आए।
मेरे अंतर की ज्वाला 
उनको न कभी झुलसाए॥

कितने प्रयत्न से उनको, 
मैं हृदय-नीड़ में अपने
बढ़ते लख खुश होती थी, 
देखा करती थी सपने॥

इस भांति उपेक्षा मेरी 
करके मेरी अवहेला
तुमने आशा की कलियाँ 
मसलीं खिलने की बेला॥
                         - सुभद्राकुमारी चौहान

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