Monday, February 4, 2019

कल्पना

कल्पना,
सागर किनारे
रेत के घरौंदे की तरह
लहरों के ठोकर खाती है
और बिखर जाती है,
और मैं -
एक जिद्दी बच्चे की तरह।
                     -कल्पना सिंह-चिटनिस   

No comments:

Post a Comment