Friday, February 1, 2019

मैं न चुप हूँ न गाता हूँ

न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

सवेरा है मगर पूरब दिशा में 
घिर रहे बादल 
रूई से धुंधलके में 
मील के पत्थर पड़े घायल 
ठिठके पाँव 
ओझल गाँव
जड़ता है न गतिमयता 

स्वयं को दूसरों की दृष्टि से 
मैं देख पाता हूं 
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ 

समय की सदर साँसों ने 
चिनारों को झुलस डाला, 
मगर हिमपात को देती 
चुनौती एक दुर्ममाला, 

बिखरे नीड़, 
विहँसे चीड़, 
आँसू हैं न मुस्कानें, 
हिमानी झील के तट पर 
अकेला गुनगुनाता हूँ। 
न मैं चुप हूँ न गाता हूँ
                     -अटल बिहारी वाजपेयी

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