Thursday, January 24, 2019

बीते रिश्ते तलाश करती है

बीते रिश्ते तलाश करती है 
ख़ुशबू ग़ुंचे तलाश करती है 

जब गुज़रती है उस गली से सबा 
ख़त के पुर्ज़े तलाश करती है 

अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार 
पीले पत्ते तलाश करती है 

एक उम्मीद बार बार आ कर 
अपने टुकड़े तलाश करती है 

बूढ़ी पगडंडी शहर तक आ कर 
अपने बेटे तलाश करती है
                              -गुलज़ार

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