Tuesday, January 22, 2019

वन-वन, उपवन(गुंजन)

वन-वन, उपवन-- 
छाया उन्मन-उन्मन गुंजन, 
नव-वय के अलियों का गुंजन! 

रुपहले, सुनहले आम्र-बौर, 
नीले, पीले औ ताम्र भौंर, 
रे गंध-अंध हो ठौर-ठौर 
उड़ पाँति-पाँति में चिर-उन्मन
करते मधु के वन में गुंजन!

वन के विटपों की डाल-डाल 
कोमल कलियों से लाल-लाल, 
फैली नव-मधु की रूप-ज्वाल, 
जल-जल प्राणों के अलि उन्मन
करते स्पन्दन, करते-गुंजन!

अब फैला फूलों में विकास, 
मुकुलों के उर में मदिर वास, 
अस्थिर सौरभ से मलय-श्वास, 
जीवन-मधु-संचय को उन्मन
करते प्राणों के अलि गुंजन!
                        -सुमित्रानंदन पंत 
              

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