Wednesday, January 23, 2019

एक पत्र

मैं चरणॊं से लिपट रहा था, सिर से मुझे लगाया क्यों? पूजा का साहित्य पुजारी पर इस भाँति चढ़ाया क्यों? गंधहीन बन-कुसुम-स्तुति में अलि का आज गान कैसा? मन्दिर-पथ पर बिछी धूलि की पूजा का विधान कैसा? कहूँ, या कि रो दूँ कहते, मैं कैसे समय बिताता हूँ; बाँध रही मस्ती को अपना बंधन दुदृढ़ बनाता हूँ। ऎसी आग मिली उमंग की ख़ुद ही चिता जलाता हूँ किसी तरह छींटों से उभरा ज्वाला मुखी दबाता हूँ। द्वार कंठ का बन्द, गूँजता हृदय प्रलय-हुँकारों से, पड़ा भाग्य का भार काटता हूँ कदली तलवारों से। विस्मय है, निर्बन्ध कीर को यह बन्धन कैसे भाया? चारा था चुगना तोते को, भाग्य यहाँ तक ले आया। औ' बंधन भी मिला लौह का, सोने की कड़ियाँ न मिलीं; बन्दी-गृह में अन बहलाता, ऎसी भी घड़ियाँ न मिलीं। आँखों को है शौक़ प्रलय का, कैसे उसे बुलाऊँ मैं? घेर रहे सन्तरी, बताओ अब कैसे चिल्लाऊँ मैं? फिर-फिर कसता हूँ कड़ियाँ, फिर-फिर होती कसमस जारी; फिर-फिर राख डालता हूँ, फिर-फिर हँसती है चिनगारी। टूट नहीं सकता ज्वाला से, जलतों का अनुराग सखे! पिला-पिला कर ख़ून हृदय का पाल रहा हूँ आग सखे! -रामधारी सिंह (दिनकर)

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